What is equity इक्विटी क्या है ? और यह कितने प्रकार के होते हैं विस्तार से जानकारी

दोस्तों अगर equity को सरल भाषा में समझे तो इसका मतलब है किसी बिजनेस में ओनरशिप का होना यानी कि equity ऐसे असेट्स asstes की ओनरशिप है जिसमें आपके पास debt और एबिलिटी भी हो सकती है जैसा कि हम किसी कंपनी का कुछ हिस्सा खरीदते हैं तो हम उस कंपनी के उतने हिस्से के ओनरशिप खरीदते हैं इसी ओनरशिप को हम equity करते हैं जिससे हम उस कंपनी के उतने ही प्रोपोर्शन में equity owner बन जाते हैं

उदाहरण के जरिए समझते हैं:-

मान लीजिए कि एक सुपरमार्केट की कंपनी को चार पार्टनर ने 10000000 रुपए लगाकर कंपनी शुरू किया चारों ने बराबर बराबर पैसे मिला कर के 25 25 लाख रुपए लगाएं कंपनी ने कुल एक लाख शेयर इश्यू किए जिससे चारों को 25 25 हजार अलॉट हो गए मतलब इन चारों फाउंडर के पास 100% equity या कह सकते हैं कि हंड्रेड परसेंट ओनरशिप है जिसकी कुल कीमत 10000000 रुपए है मतलब हर फाउंडर के पास 25 25 परसेंट इक्विटी है और अगर बिजनेस को आगे बढ़ाने के लिए और पैसों की जरूरत पड़ती है तो और फाउंडर ने 50 परसेंट equity बेचने का फैसला लिया और आईपीएल के जरिए 100000 में से 50000 शेयर्स पब्लिक में बेचकर 5000000 रुपए रेस के यहां पर कंपनी ने हर 1000 शेयर पर अपनी एक परसेंट equity बेच दिए मतलब किसी ने कंपनी के 1000 शेयर खरीदे हो तो उसे कंपनी की एक परसेंट equity या एक परसेंट ओनरशिप मिल जाएगी

Equity और shares में डिफरेंट :-

सबसे पहले अगर equity की बात करें equity का मतलब है ऑनर्स द्वारा कंपनी में इन्वेस्ट किए गए कैपिटल

वही शेयर का मतलब है इस इन्वेस्टेड कैपिटल या equity का डिवीजन divison

और यहां equity पूरे बिजनेस को दर्शाता है

वही शेयर बिजनेस में उतने ही कंट्रीब्यूशन को दर्शाता है जितना कॉन्ट्रिब्यूशन आपने कुछ शेयर को खरीदने में इन्वेस्ट किए हैं

किसी भी कंपनी की equity उसके shareहोल्डर्स की equity के साथ-साथ उसके रिसॉक्स और सरप्लस को मिलाकर होती है

जबकि शेयर के केस में सिर्फ़ शेयर होल्डर equity ही इसका पार्ट होती है

Reserves और surplus नहीं

Equity मे शेयर भी कवर हो जाते हैं क्योंकि यहां larger turm है

जबकि अगर शेयर की बात करें तो शेयर equity का एक हिस्सा मात्र है

Equity की वैल्यू निकालने के लिए हमें कंपनी की टोटल assets में से उसके टोटल लायबिलिटी निकलते है

जबकि share मे हम टोटल असेट्स में से लायबिलिटीज के अलावा reserves और सरप्लस surplus को निकालते हैं

जब भी न्यू कंपनी स्टार्ट होती है तो वाह कंपनी शुरू कैसे होती है मतलब कुछ इन्वेस्टमेंट या कैपिटल इनिशियल स्टेज पर लगता ही है तो यह इनिशियल कैपिटल या तो उस कंपनी का ओनर लेकर आता है या तो कोई इन्वेस्टर इन्वेस्ट कर देता है या फिर वहां बैंक से लोन लेकर आते हैं अगर यहां पर कोई ओनर या इन्वेस्टर इन्वेस्ट करता है तो उसे equity कहते हैं अगर वही हम बैंक से लोन ले तो कंपनी के लिए debt हो जाता है

उदाहरण :-

अगर मुझे एक कंपनी स्टार्ट करनी है जिसको स्टार्ट करने में लगेंगे 1000000 रुपए अब यह 1000000 में से मैंने खुद के ₹300000 लगाएं और बाकी बचे हुए 700000 मैंने बैंक से लोन ले लिया मतलब की 10 लाख के बिजनेस में मतलब मेरी 30% की ओनरशिप होगी equity यानी ओनरशिप होती है मतलब की आप किसी कंपनी में जितना अमाउंट इन्वेस्ट करते हैं तो आप इतने अमाउंट या उतने परसेंट के मालिक बन जाते हैं तो यहां मैं 30% की ऑनर हूं क्योंकि बाकी के 70% मैंने बैंक से लोन लिया है मतलब कि जैसे जैसे मैं इस बैंक के लोन को पे करते जाऊंगी तो मेरी ओनरशिप भी बढ़ती जाएगी वैसे ही अगर हम बात करें अपने इन्वेस्टमेंट की तो मान लीजिए रिलायंस इंडस्ट्रीज की 10000 की शेयर्स लेते हैं तो इस कंपनी में हमारे 10000 की ओनरशिप होगी और इसी के साथ रिलायंस इंडस्ट्रीज की फ्यूचर ग्रोथ से डिपेंड करेगा कि मुझे इस ओनरशिप से मुझे प्रॉफिट होने वाला है या लॉस मतलब किसी भी कंपनी में equity लेने से हमें उतने परसेंट की वोटिंग राइटस भी मिलते है

हम equity को ऐसे भी डिफाइन कर सकते हैं कि कल को अगर हमने कंपनी के सारे ही assets को लिक्विडेट कर दे और debt को payoff कर दे तो जो बचा हुआ पैसा होगा तो कंपनी के शेयर होल्डर को मिल जाएगा अगर आपको किसी कंपनी की equity जानने हो कि कितनी है तो आप टीकर पर जाकर और कंपनी के बैलेंस शीट मे देख सकते हैं आपको equity और लायबिलिटीस के सेक्शन में उस कंपनी की equity value पता चल जाएगी और किसी भी कंपनी का equity सेक्शन कंपनी की फाइनेंशियल हेल्थ का आईडिया दे देता है

Types of equity

(1) नॉर्मल इक्विटी शेयर

(2)प्रेफरेंस शेयर्स preference shares

जैसे मैंने अपना बिजनेस स्टार्ट किया था तो मान लेते हैं उसमें ऐसे लोग थे जिसने मुझे पैसे दिए थे तो मैं उनको एक रिफरेंस प्रोवाइड करती हूं भले ही मैं इस कंपनी से प्रॉफिट मिले चाहे ना मिले तो मैं पहले आपको पैसे रिटर्न करूंगी तो मैंने इन शेयर होल्डर्स को कहीं ना कहीं पहले अपनी प्रेफरेंस दे रखी है तो ऐसे equity को कहेंगे प्रेफरेंस शेयर्स preference shares

अब अगर बात करें equityकी तो इसके भी 2 part होते हैं

पहला होता है की ओनर खुद कैपिटल लगाता है

और दूसरा इन्वेस्टर से लेता है और उसे शेयर कैपिटल कहते हैं

दूसरे होते हैं reserves और सरप्लस surplus यह भी इक्विटी का एक हिस्सा होता है इसमें जैसे कंपनी को ₹500000 का प्रॉफिट हुआ है और मैंने ₹500000 में से दो लाख प्रेफरेंस शेयर मे डिस्ट्रीब्यूटर कर दिया और बाकी बचे तीन लाख में से एक लाख इक्विटी में और फिर बाकी बचा 200000 रुपए reserves और surplus मे रख दूंगी यानी यह reserves आना तो equity के हिस्से में था लेकिन जब कंपनी आगे चलकर ग्रो करेगी तो उसके लिए मुझे पैसे चाहिए होंगे तो के लिए सेविंग में अपने reserves और surplus के थ्रू करूंगी तो यहां भी equity का एक हिस्सा होगा

तो अगर अब बात करें की equityमें इन्वेस्ट करना क्यों अच्छा होता है तो के कई सारे बेनिफिट्स है

जैसे कि सबसे अच्छा है हाय रिटर्न high returns भले ही स्टॉक मार्केट रिस्की होता है लेकिन अगर हम एक सही कंपनी चूस करते हैं सही रिसर्च करके तो equity काफी अच्छा ऑप्शन है वेल्थ क्रिएट करने के लिए और हम सब जानते हैं कि inflation एक ऐसी चीज है जिसे बहुत से लोग इन्वेस्ट करते समय कंसीडर करना ही भूल जाते हैं और अपनी शेविंग एफ डी या debt स्कीम में इन्वेस्ट कर देते हैं बस यह सोच कर कि equity में इन्वेस्ट करना रिस्की है लेकिन हम एफडी से इन्फ्लेशन रेट को बिट नहीं कर सकते हैं तो आपको equity me invest करनी ही चाहिए ताकि आप इन्फ्लेशन रेट को बीट कर सके और सही तरीके से वेल्थ क्रिएट कर सको लेकिन स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट करना थोड़ा रिस्की है

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आज हमने सीखा :-

मैं आशा करता हूँ आप लोगों को ( equity) के बारे में समझ आ गया होगा. मेरा आप सभी पाठकों से गुजारिस है की आप लोग भी इस जानकारी को अपने आस-पड़ोस, रिश्तेदारों, अपने मित्रों में Share करें, जिससे की हमारे बिच जागरूकता होगी और इससे सबको बहुत लाभ होगा.

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